Saturday, May 15, 2010

बोलिए....ये हमारे सरोकार हैं ..........

कितना पानी ढोलते है,मकान मालिक को तो पता ही नहीं,रोज़ रोज़ पाइप लगा कर नहाते है ,किससे कहे ,कैसे कहे? ये रोज़ ही महिला मंडली की चर्चा का विषय होता था.नयी बसी कालोनी में नित नए मकान बनते थे,जहा सामान की रखवाली के लिए चौकीदार होते थे,उन्हें टूबवेल चलने की आज़ादी होती थी और पानी बर्बाद करने की भी।
एक शाम जब ये चर्चा चल रही थी तभी मैं भी मंडली में शामिल हुई और पूछा माजरा क्या है,तब पता चला की सामने के मकान में रोज़ पानी की बर्बादी हो रही है। अपने अनुभव से ये तो जान ही लिया था कि पानी यदि बरसात के मौसम से ही सहेज कर नहीं रखा तो गर्मी में टूबवेल साथ नहीं देंगे।
दूसरे ही दिन शाम को २-३ लड़के पाइप चालू करके नहा रहे थे.पानी भरपूर बह रहा था। पानी बेकार बहता देख कर पारा चढ़ जाता है,और मुझे याद आ जाते है वो दिन जब मई-जून की गर्मी में सारा दिन बिना पानी पिए गुजारा करती थी .पैसे लेकर भी कोई पानी भरने को तैयार नहीं होता था..क्योंकि पानी का कोई स्त्रोत ही नहीं था।
बस पहुँच गयी वहा और उन लडको से कहा ,कितना पानी बहा रहे ?
बोले आंटीजी नहा रहे है।
ठीक है पर नहाने के लिए बाल्टी में भी तो पानी लिया जा सकता है ।
जी पर यहाँ पानी तो है न ।
हा पानी है पर इस तरह बहावोगे तो एक दिन ख़त्म हो जायेगा । तुम्हे मालूम है गाँवों में लोग कितनी मुश्किल से गुजारा करते है। तुम्हारे ही घर में औरते कितनी दूर से सर पर पानी ले कर आती है। किस गाँव के हो तुम लोग?
आंटीजी,निमाढ़ के।
तो तुम्हे नहीं मालूम वहा पानी की कितनी परेशानी है?
जी मालूम है।
फिर ?? फिर भी यहाँ मिल रहा है तो बेकार में बर्बाद कर रहे हो। अरे जीतनी जरूरत हो वापारो ,ज्यादा हो तो किसी जरूरतमंद को देदो,पर इस तरह बर्बाद तो मत करो।
जी आंटीजी,हम समझ गए ,हमने ये सोचा ही नहीं था,अबसे हम पानी बेकार नहीं धोलेंगे
टूब वेल तो कब से बंद हो गया था। उस दिन के बाद उन लडको ने कभी पानी बर्बाद नहीं किया।
मन को एक संतुष्टि मिली,पर कई प्रश्न भी उठ खड़े हुए ।
*जब लोगो ने देखा तो खुद उन लडको को ऐसा करने को मन क्यों नहीं किया?
*लोग सही बात कहने को बुरा बन्ने का खतरा क्यों समझते ?
*क्या यही बात मैं किसी पढ़े लिखे व्यक्ति को समझती तो वो भी इसे इतनी आसानी से समझ जाता?
तो जब भी आप अपने आस-पास कोई गलत kaam होते देखते है तो कुछ कहते क्यों नहीं? ये हमारा समाज है,हमारे सरोकार है इन्हें हमहें ही सुधारना है.और कई काम तो अक्सर अनजाने में होते है आप को बस एक बार बताना है ये ठीक नहीं है ,पर अधिकतर लोग इतनी भी जहमत नहीं उठाते,क्यों??????

Thursday, May 6, 2010

समय

शादी के चार ही महीने बाद अपनी गृहस्थी ले कर गाँव में जाना पड़ा नेहा को । पति की पहली पोस्टिंग ,हेड ऑफिस पर रहना जरूरी था । छोटा सा गाँव उस पर साहब का तमगा,गाँव की राजनीती,किसी के घर आना जाना नहीं होता था.घर में पड़े पड़े उकता जाती थी नेहा। तभी गाँव के स्कूल में एक अध्यापक की नियुक्ति हुई,घर के पास ही उनका घर था.उनकी भी नयी नयी शादी हुई थी, नेहा को लगा चलो कोई तो मिला जिससे दो घडी बोल-बतिया लेगी.जल्दी ही जान पहचान हो गयी,और कभी कभी रचना के घर आना जाना भी होने लगा.एक शाम नेहा अपनी सखी से मिलने के लिए उसके घर गयी पर न जाने क्या हुआ नेहा को देखते ही रचना पलटी और घर के अंदर चली गयी। अपने को अपमानित सा महसूस कर नेहा उलटे पाँव घर लौट आयी। कई दिनों तक यही सोचती रही की आखिर हुआ क्या ?रचना ने भी इसके बाद कोई सम्बन्ध नहीं रखा.वह समझ गयी जरूर किसी ने कोई गलतफहमी पैदा कर दी है।

दो साल बीत गए,एक बार पति के ऑफिस के एक कर्मचारी को देखने हॉस्पिटल जाना हुआ ,वहा जाने पर पता चला की मास्साब के ससुरजी भी भर्ती है चलती बस से गिर गए है । इंसानियत के नाते उन्हें भी देखने गए,सभी रिश्तेदार इकठ्ठे थे रचना उन्ही के साथ खड़ी थी ,देखा कर पास आयी पर कुछ बात नहीं हुई। मास्टरजी से हाल -चाल पूँछ कर वापस आ गए.अगली सुबह फिर हॉस्पिटल जाना हुआ,तो पता चला की रचना के पिताजी गुजर गए है,वहा जाने पर मास्टरजी नेहा और उसके पति को तुरंत अलग ले गए और बोले अभी रचना और उसकी माँ को कुछ नहीं बताया है आप भी अभी कोई बात नहीं करें। तब तक रचना भी वहां आ गयी,नेहा की और देख कर बोली क्या हुआ ?और नेहा की आँखों में आंसू देख कर नेहा के गले लग कर फफक कर रो पड़ी।

उसकी पीठ सहलाते हुए नेहा ने जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा ,समय बड़ा बलवान है ,कब किस को किस हाल में किसके सामने खड़ा कर दे नहीं पता.

दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी  "मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे...