Sunday, February 27, 2011

विद्या दीदी


विद्या दीदी हाँ यही तो नाम है कही किसी रिश्ते से दीदी लगती है है उम्र में मुझसे बहुत बड़ी शायद मेरी मम्मी की उम्र से कुछेक ही साल छोटी. रौबदार चेहरा माथे पर बड़ी सी बिंदिया गरजदार आवाज़ ,जब भी अपने मायके आती थी भाभियाँ सेवा में लगी रहती थी. हर काम सलीके से होना चाहिए,किसी काम में कोई कोताहि देखी और डपट दिया फिर वो भाई हो या भतीजा फिर भाभियों की तो कौन कहे. दो बेटियों और दो बेटों का भरा पूरा परिवार ,जीजाजी भी उनके आगे पीछे ही घूमते थे . यों तो वो बेटियों पर जान छिड़कती थी ,पर नियम कायदे ,रीति रिवाज़ सबके लिए एक सामान थे.

बेटियां बड़ी हो गयी तो अच्छे घर वर देख कर शादी कर दी,पर हाँ परिवार सबके भरे पूरे थे. उनके यहाँ भी हर तीज त्यौहार समारोह पर रिवाज के अनुसार आना जाना व्यव्हार करना ,कुल मिला कर बहुत परम्परावादी है विद्या दीदी.

बेटियों के बाद बेटों की बारी आयी शादी की बहुत सोच समझ कर सुंदर सुघड़ बहू धुन्धी दीदी ने जब भी मिलती करीने से सर ढके , सारे सुहाग संस्कार सजाये , हमारे जाते ही दीदी की आँख का इशारा होता और वह पैर छूने झुक जाती ,बैठ कर पैर छुओ ये क्या ऊँटों जैसे हो कर छूती हो,सबके सामने ही नसीहत देने से नहीं चूकती थी दीदी . हमारे चाय नाश्ते का इंतजाम कर के अगर बहू अंदर चली जाती तो दीदी बुलाती अरे आरती तुमने चाय पी की नहीं यही आ जाओ,लाओ सब्जी मुझे दे दो में सुधार दूँगी तुम नाश्ता कर लो. काम में उसका पूरा साथ देती ,खाने पीने पहनने ओढ़ने का पूरा ख्याल रखती पर कायदे कानून सबके लिए एक.हम तो कभी कभी बातें भी करते दीदी की बहु कैसे रहती होगी इतनी तेज़ सास के साथ .

एक दिन अचानक खबर आयी दीदी का बड़ा बेटा तीन दिन के बुखार के बाद चल बसा .डाक्टर ने आकर देखा एक इंजेक्शन लगाया अचानक हाथ पैर ऐठने लगे और कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही खेल ख़तम हो गया. मात्र २६ साल की उम्र थी बहु तो २३ की ही थी गोद में २ साल की बच्ची .कैसे अचानक हँसता खेलता संसार उजड़ गया ,रह रह कर भरे भरे हाथ ,करीने से सजी मांग,हर तीज त्यौहार पर मेहन्दी रचाई हथेलियाँ याद आती. होनी को कौन टाल सकता है.

बेटे की मौत के करीब ६ महीने बाद दीदी से फिर मिलना हुआ ,बिलकुल थकी थकी निढाल सी बाल बिखरे हुए गुमसुम सी दीदी ,बेटे से ज्यादा इस लड़की का दुःख खा जाता है मुझे ,जब भी इसे देखती हूँ रुलाई नहीं रुकती देखा ही क्या था अभी इसने ,इतनी बड़ी जिंदगी है,जब तक हम है बेटी बना कर रखूंगी इसे पर हमारे बाद..देवर है पर देवरानी कैसी आये कैसे रखे? इसके माँ-बाप ने तो कहा भी की भेज दो हमारे पास पर पोती में मेरी जान अटकी रहती है एक ही तो निशानी है मेरे बेटे की अब .

दीदी से हुई वह मुलाकात दिल भारी कर गयी . इसके बाद बहुत दिनों तक उनसे मिलना नहीं हुआ,न उनके यहाँ जाना हुआ. करीब डेढ़ साल बाद दीदी के यहाँ अचानक जाना हुआ देखा पुरानी विद्या दीदी सोफे पर बैठी है वही गरजदार आवाज़ माथे पर बड़ी सी बिंदिया सलीके से संवारे बाल. पोती के साथ हंस हंस कर खेल रही है उसकी तोतली बातों पर दोहरी हुई जा रही है. पास ही बहू भी बैठी थी करीने से ढंका सर ,हाथ भर चूड़ियाँ .सलीके से भरी मांग . हमारे जाते ही दीदी की आँख का इशारा हुआ उसने आकर हमारे पैर छुए,और पानी लेने अंदर चली गयी.

बहुत सोचा मैंने अपने बेटे की निशानी के लिए इसकी जिंदगी यों नरक तो नहीं होने देती ना? रिश्ते भी एक दो आ रहे थे पर ये भी तो मेरे बेटे की निशानी है ये भी चली जाती. फिर सोचा शादी करनी ही है तो छोटा बेटा भी तो है ना ,उससे बात की उसका मन टटोला उसे भी खूब सोच समझ लेने का मौका दिया आरती से भी बात की फिर एक अच्छे दिन मंदिर में जा कर फेरे पडवा दिए अब बस बेटा नहीं है पर उसकी सब निशानियाँ मेरे पास है . ठीक किया ना मैंने??

मैंने मौन दीदी के हाथ पर अपना हाथ रखा दिया .आज दीदी ने रीति रिवाज संस्कार सभी का सही अर्थ समझा दिया था.

Wednesday, February 23, 2011

कुकून


इस नयी सड़क पर आज पहली बार आया हूँ। शहर से दूर दोनों और पेड़ों से आच्छादित शांत सी सड़क। बिना ट्राफिक के ....गाड़ी चलने का मजा तो यहाँ है। अब अगले ३-४ दिन रोज़ यहाँ आना है । रास्ते में चार स्कूली बच्चे पीठ पर बैग लटकाए अपनी बातों में मशगूल चले जा रहे थे। अपने स्कूल के दिन याद आ गए। पता नहीं कितनी दूर है इनका स्कूल ?क्या करू इन्हें लिफ्ट दे दूं। नहीं नया रास्ता नए लोग ,फिर पता नहीं कितनी दूर हो? में बगल से आगे बढ़ गया।
अगagale ले दिन फिर वही बच्चे मिले ,पलट कर गाड़ी को देखा भी नहीं में लिफ्ट दूं न दूं की उहापोह में आगे बढ़ गया।
पापा, पता है तितली के बच्चे जब कुकून से निकलते है तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। पर अगर कोई उनकी मदद कर के कुकून को तोड़ दे और उन्हें बाहर निकाल दे तो वो जी नहीं पाते उनके पंख कमजोर रह जाते है बेटे ने बताया।
आज फिर वही बच्चे मिले अपनी धुन में मशगूल मैंने उन्हें लिफ्ट देने का नहीं सोचा ,में कुकून तोड़ने में मदद कर उन तितलियों के पंख कमजोर नहीं करना चाहता ।

Sunday, February 20, 2011

अरे मैडम.....

कहते है जिंदगी हर कदम पर कुछ न कुछ सिखाती है,और ये पाठ हमें अपनी या दूसरों द्वारा किये गए भूलों ,कामों से तो मिलती ही है जीवन में मिलने वाले लोगो के सानिध्ध्य से भी मिलती है। अपने शैक्षणिक जॉब के दौरान सबसे ज्यादा सानिध्ध्य तो बच्चों का ही रहता है और बच्चे बहुत अच्छे शिक्षक होते है बस जरूरत है उनके काम, व्यवहार, बातों को उस सकारात्मक नज़रिए से देखने की।

कुछ ही दिन पहले की बात है। दोपहर भोजन के दौरान क्लास ५ की कुछ लड़कियों को रोते हुए देखा। कारण पूछने पर पता लगा उनकी क्लास की ही किसी लड़की से लड़ाई हो गयी है ,उसने कुछ कहा है और इस वजह से एक दो नहीं पूरी ५ लड़किया हिलक हिलक कर रो रही है। अब एक लड़की लड़ाई में ५-५ लड़कियों को रुला दे तो पहला ख्याल मन में आता है ,जरूर उसने कुछ किया ही होगा...खैर उन लड़कियों को किसी तरह चुप करवा कर खाना खिलाया और में बात करूंगी इस बात का आश्वासन दिया ।

खाने के बाद उस लड़की को देखा तो अपने पास बुलाया...अभी हम उसे दिव्या कहे? इससे बात करने में आसानी होगी। खैर मैंने पूछा दिव्या क्या हुआ?
मैडम कुछ नहीं ,उसने भोले पन   से जवाब दिया ।
firनीसारी सारी साऱी  लड़कियाँ क्यों रो रही है।
अरे मैडम वो ,अरे मैडम कुछ नहीं एक ने मुझसे कहा की मैंने दूसरी लड़की को चिडचिडी कहा और जब मैंने दूसरी लड़की को बताया तो पहली वाली ने मना कर दिया अब सब मेरे पीछे पड़ गयी है।
मुझे समझ तो कुछ नहीं आया ,फिर भी मैंने कहा ,लेकिन इस बात के लिए इतने सारे लोग क्यों रो रहे है?

अरे मैडम कुछ नहीं,ये सब कहते है की में बहुत चिडचिडी हूँ ,मैंने कहा ठीक है में मान लेती हूँ की चिडचिडी हूँ ,तो क्या बहुत सारे लोग होते है। पर मैडम मैंने कहा की में अपने को बदल लूंगी । अब मैडम एक दिन में तो सब नहीं बदल जायेगा न? मैंने कहा है में अपने को बदल लूंगी...
मैडम सब पता नहीं क्यों मेरे पीछे पड़  जाते है ...में ऐसी हूँ वैसी हूँ ...तो क्या हुआ मैडम ,मैंने कह तो दिया में बदल लूंगी खुद को। अब रोना तो मुझे चाहिए इस बात पर ,और देखिये में तो रो नहीं रही हूँ और ये सब रो -रो कर तमाशा कर रही है।
में अवाक् उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रही...किसी भी परिस्थिति को स्वीकार करने का उसका नजरिया किसी अनुभवी प्रोफेशनल से कम  न था।
दिव्या ,ये तो बहुत अच्छी बात है की तुम उनकी बातों को सकारात्मक तरीके से लेती हो और खुद को बदलने के लिए तैयार हो ,तो क्यों नहीं तुम उनसे जाकर बात करती हाथ मिलाओ और फिर से दोस्त बन जाओ।
अरे मैडम आज नहीं अभी जरा उन सबको ठंडा हो जाने दो ,आज में बात करूंगी भी न, तो कोई सुनेगा नहीं। में बाद में उनसे बात कर लूंगी। वैसे भी मैडम अगले हफ्ते मेरा बर्थ डे आने वाला है ,देखना में कार्ड दूँगी न तो सब पार्टी में आ जायेंगे।
में उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रह गयी.उस कक्षा ५ की १० साल की लड़की का परिस्थितिओं को देखने का नजरिया ,उन्हें अपने हिसाब से ढाल लेने का विश्वास मुझे जिंदगी को नए तरीके से देखने का सबक सिखा गया।
और हम है की किसी ने कुछ कहा दिल से लगा लिया। उसने बात नहीं की सोच में डूब गए , हमसे क्या गलती हुई या दूसरों की गलती ढूँढने में लग गए ,हर बात में खुद को या दूसरों को ही दोषी मानाने लगे। जो है उसे अभी इसी वक्त सुलझाने की उधेड़बुन बात को और और उलझा जाती है और हम समझ ही नहीं पाते गलती आखिर हुई कहा?
कुछ भी कहिये इसे आप अपने नज़रिए से लीजिये पर मैंने तो भाई बहुत कुछ सीखा..और आपने?????

Wednesday, February 2, 2011

सिलसिला

हम हंस हंस के भुलाते गए उनकी ख़ताओं को
और उन्होंने हमें ही कसूरवार ठहरा दिया.....
ख़ताओं का इल्जाम ही क्या कम न था
जो सरे आम हमें रुसवा किया।
जो तुम को हो सुकून तो हम क्या गिला करे
आओ फिर ख़ताओं का सिलसिला शुरू करे....

सजा

खता जो तुमने की,
सजा क्यूँ हमको दी...
चुप से सह लेते हम सजा भी।
फिर क्यूं तुमने शिकायत की ,
सह लेंगे सभी शिकवे भी
पर जो सजा तुमने खुद को दी
सह न सकेंगे ........

दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी  "मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे...