Monday, December 1, 2014

अलमस्त

 
घर से निकलते हुए ठिठक कर वह सामने से जाते उस लड़के को ध्यान से देखने लगा। कान में हेड फोन लगाये सीटी बजाता वह लापरवाही से जेब में हाथ डाले टहलता हुआ लगभग रोज़ ही निकलता था और वह रोज़ ही उसे एक नज़र देख ही लेता था। वह खुद भी तो ऐसा ही था चंद सालों पहले अलमस्त सा। अब वह उसे देख कर उन दिनों की याद कर एक उसाँस भर कर रह जाता है। पढाई पूरी होते ही एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज की नौकरी के एवज़ में उसने वे दिन कहीं खो जो दिए थे। 
कविता वर्मा 

Thursday, November 27, 2014

गहरे हैं रंग ' कैनवास पर प्रेम ' के


विमलेश त्रिपाठी जी का उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम ' के नाम ने ही मुझे आकर्षित किया था। नाम से कहानी का जो कुछ अंदाज़ा हुआ था वो ठीक ठीक होते हुए भी उससे बहुत अलग भी था। 
कहानी अपने आप में ढेर सारी त्रासदियों घटनाओं दुविधाओं और दुश्चिंताओं को समेटे एक सम्मोहक माया जाल सा बुनती है जिसमे आप कभी कहीं खो जाते है तो कभी किसी पल पर ठिठक कर उसे महसूस करते रह जाते हैं। 
कहीं एक बच्चे के दुःख से उपजते कलाकार को धीरे धीरे बड़ा होते देखते हैं तो कभी उस कलाकार को मौत की ओर कदम बढ़ाते देख काँप जाते हैं इस आशंका में कि ये कहानी पूरी होगी भी या नहीं। कई बार कहानी के अधूरा रह जाने की आशंका जल्दी जल्दी पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती है लेकिन यकीन मानिये कि उस पल की कशिश आपको एक साथ कई पन्ने पलटने से रोक भी लेती है। 
इसमें एक मासूम से प्यार की दास्ताँ है ,तो एक ऐसे दोस्त की कहानी जो बिना कहे सब समझ जाता है तो बिना पूछे सब कर भी जाता है। दोस्ती का ऐसा विश्वास है कि पढ़ते पढ़ते रुक कर आप अपने दोस्तों की फेहरिस्त पर एक नज़र डाल कर उनमे एक ऐसा दोस्त जरूर ढूंढेंगे। 
वैसे जिंदगी में कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हे हम अपना दोस्त नहीं कहते हैं लेकिन वे हमारे दोस्त से शुभचिंतक होते हैं। ऐसे लोगों की मौजूदगी ने इस कहानी में मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया है। 
प्यार की कशिश तो शायद इसके अधूरे रह जाने में ही है लेकिन अधूरे प्यार के बीते लम्हों के साथ एक पूरी जिंदगी जी जा सकती है। 
कहानी उलझे पारिवारिक ताने बाने के साथ घरेलू क्रूरता असहायता और निस्पृहता के साथ एक आक्रोश , दया और लगाव पैदा करती है। सुदूर गाँव के खेतों में दौड़ते ,गाँव के बाहर किसी बूढ़े पेड़ के तले अचंभित कर देने वाले पलों को पीछे छोड़ अचानक कोलकाता जैसे बड़े शहर में आ जाती है और आप खेतों की मेढ़ पर ठिठके खड़े उसके वापस लौट आने की प्रतीक्षा ही करते रह जाते हैं। 
कहानी में लेखक और उसके कथाकार का द्वंद कहानी की गति धीमी कर देता है जिसमे कभी कभी तो कहानी खो सी जाती है और उसके सिरे  पकड़ने के लिए आपको  संघर्ष करना पड़ता है। लेखक का एक घरेलू व्यक्तित्व होना और अपने लेखन को जिन्दा रखने के लिए उसकी सतत जिजीविषा भी कहीं कहीं कहानी पर हावी हुई है लेकिन उस पर भी लेखक का संवेदनाओ से भरा इंसान होना और इन संवेदनाओ को लेखन से ऊपर रखना दिल छू  जाता है। लेखक  के व्यक्तित्व की दृढ़ता कई जगह कई रूपों में सामने आई है। 
कहीं कहीं हिंदी में भाषायी त्रुटियाँ खटकती हैं लेकिन बीच बीच में भावार्थ सहित सुन्दर बंगाली कविताओं की खनक इसे नगण्य कर देती है। 
कुल मिला कर कैनवास पर प्रेम शब्दों के साथ धीमे धीमे आपके अंदर उतरता है और अपने गहरे रंगों के साथ आपके दिलो दिमाग पर चित्रित हो जाता है।  
कविता वर्मा 

Sunday, November 16, 2014

देहरी


पढाई ख़त्म होते ही सोचा था कही अच्छी सी नौकरी कर के परिवार से रूठी खुशियों को वापस मना लाएगी लेकिन बिना अनुभव बिना सिफारिश कोई नौकरी आसानी से मिलती है क्या ?महीनो ठोकरे खाने के बाद आखिर उसने वह राह पकड़ी। कॉल सेंटर पर काम करने का कह कर शाम ढले घर से निकलती और पैर में घुँघरू बांधे अपने दुःख दरिद्र को पैरों से रौंदते अपने समय के बदलने की राह तकती। पैरों की हर थाप पर मन आशंकित रहता कहीं माँ बाबा को पता ना चल जाये नहीं तो वो जीते जी मर जायेंगे। मन खुद को ही समझाता कि वो जो कर रही है मज़बूरी में और परिवार के लिए ही कर रही है। लेकिन मन ही मानने को तैयार नहीं होता तो माँ बाबा कैसे समझेंगे यह आशंका सदा बनी रहती। मैं उन्हें कभी पता नहीं चलने दूँगी वह खुद से प्रण करती पर उनसे झूठ बोलने की कसक हमेशा बनी रहती। 
ऐसे ही एक शाम खबर आई बाबा को कुछ हो गया है होश ही कहाँ रहा उसे जैसी थी वैसे ही दौड़ पड़ी घर को। यहाँ उसने घुँघरू बंधे पैरो से देहरी लांघी वहाँ बाबा ने आखिरी हिचकी ली। वह वहीं थम गई समझ नहीं पाई उसने अभी देहरी लांघी है या बाबा ने उसी दिन दम तोड़ दिया था जिस दिन उसने घुँघरू बांधे थे। 
कविता वर्मा

Sunday, October 26, 2014

इरादा

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं। ये समुन्द्र उनके जीवनसाथी को निगल चुका था अब वो अपने बेटे को उसके पास भेजने से भी डरती थीं।उसके साथी बच्चे जब लहरों की सवारी करते वह गुमसुम सा उन्हें देखा करता। एक दिन शायद समुन्द्र ही उसकी उदासी से पिघल गया और ऐसा बरसा कि उसके आँगन तक पहुँच गया। उसने भी कहाँ देर की कूद पड़ा उथले पानी में और लगा हाथ पैर चलाने। समुन्द्र और मछुआरे का मिलन हो ही गया। 
कविता वर्मा

Friday, October 10, 2014

जमींदार


मॉल में घूमते हुए चकाचौंध देखते उसके मुँह से एक आह निकल गई। कितना पैसा होता है इन शहर के लोगो के पास। 
वैसे तो गाँव में भी कुछ लोगो के पास बहुत पैसा है। उसे गाँव के जमींदार के ठसके याद आ गए। 
बचपन में एक बार उसने अपने दादाजी से पूछा था, "दादाजी जमींदारो के पास इतना पैसा कहाँ से आता है ?" 
दादाजी ने ठंडी सांस भरकर जवाब दिया था ,"बेटा गरीबो का खून बहुत कीमती होता है अमीर चूसते हैं तो सोना बन जाता है। "खून सोना कैसे बनता है वह समझ न सका था। 
माल से बाहर आते हुए उसकी नज़र सड़क किनारे रेहड़ी लगाये खड़े मैले कुचैले आदमी पर पड़ी। दो अौरतें उससे पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं। उसने एक नज़र मॉल पर डाली दूसरे ही पल खून का सोना बनना , समझते हुए वह शहरी जमींदारों की संख्या का अनुमान लगाता घर की ओर चल दिया। 
कविता वर्मा

Friday, September 5, 2014

पत्थरों में फूल

 
छोटे से गाँव की छोटी सी सीमा सी ही तो सोच थी उसके माता पिता की जब उन्होंने आठवी के बाद उसे आगे पढ़ाने से मना  कर दिया था। किसी तरह खुद को बाल विवाह की त्रासदी से बचा कर वह शहर भाग गई थी। कितनी जद्दोजहद कितने संघर्ष के बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाई। माँ बाबा का लाड पीछे खींचता ज्ञान की रोशनी आगे। पत्थर ही तो कर लिया था उसने अपने मन को जिसपर प्यार का कोई अंकुर न फूटने पाये सारे नाते तोड़ दिए ताकि उन पहाड़ों से , ताकि अपना सर ऊँचा उठा सके, लेकिन पहाड़ों से ऊँचे पत्थर हो सके है भला ?
आज पत्थरों को भी पहाड़ों की गोद याद आ गई मन दौड़ कर वहाँ पहुँचा लेकिन वक्त के थपेड़ों ने सब छितरा दिया। बचे है तो सिर्फ खंडहर वह अपनी रुलाई ना रोक पाई। समझ नहीं पा रही है ऊपर उठने की चाह गलत थी या आगे बढ़ने की। बेड़ियाँ तोड़ने की या नई मंजिल पाने की ? 
सूनी आँखों से एक बार फिर देखा पत्थरों में भी कोपले फूटी हुई हैं। उसके होंठों पर एक मुस्कान आई एक नए संकल्प के साथ वह उठ खड़ी हुई।  
कविता वर्मा 

Sunday, July 13, 2014

जिंदगी की ताल

जिंदगी की ताल 
ऐय लड़कियों सही संझा घर से बाहर ना निकरो ,ज्यादा जोर से न हँसों , आग लगे तोहरे गले में जब देखो फूटे बाँस सो बजत रहत है ,पाँव में तो घूमर पड़े हैं सीधे एक जगह बैठो नहीं जात दिन भर नचती रहती हो। गाँव के हर घर में सुबह से शाम तक हर लड़की यही बातें सैकड़ों बार सुन लेती थी। और बातें सुनाई भी क्यों ना जाएँ आये दिन तो खेत खलिहानों की मेढ़ पर बेटियों की आबरू लूटी जाती थी। पता नहीं ये दरिंदे खेत से ही पैदा हो कर खलिहानों में ही कहाँ गायब हो जाते थे। कभी लड़की की जिन्दा लाश मिलती तो कभी किसी पेड़ से लटकी हैवानियत की दास्ताँ मिलती।
लड़कियों का घर से निकलना पढ़ना लिखना सब बंद हो चुका था .हर तीसरे घर में जिंदगी को लाश की तरह ढोती और लाश बनने से डरती जिंदगियाँ सिसक रहीं थीं। तीज त्यौहार शादी ब्याह सभी तो डर के साये में गुजरते थे।
एक दिन कुछ जिन्दा लाशों ने खुद में दबी पड़ी चिंगारी को फूंक मार कर सुलगाया और प्रण किया की अब और नहीं। नन्ही कलियों को खिलने खिलखिलाने से अब नहीं रोका जायेगा। हम इनकी रक्षा करेंगे उस दिन जब इन लाशों में प्राण फुंके इनके हाथों में चूड़ियों की जगह बंदूकें आ गई कई कद्दवारों के हौसले पस्त हो गए। जिस तरह दरिंदे हवा में घुल जाते थे उसी तरह ये रक्षक हवा से प्रकट होने लगे। जिंदगी ने पैर में घुंघरू बाँध लिए जीवन की सुरीली तान से गलियाँ गूँज उठीं।
कविता वर्मा

Monday, July 7, 2014

सपनों के परिंदे


मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ जी चाहता है तुम्हे अपनी पलकों में छुपा कर रखूँ सिर्फ मैं ही तुम्हे देखूँ और कोई ना देख सके। तुम्हारी नीली आँखों में सिर्फ मेरा ही अक्स हो सिर्फ मेरा। तुम भी मुझे इतना ही प्यार करती हो न ?
उसके प्यार के इस इज़हार में उसकी भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। प्यार तो मैं भी करती हूँ लेकिन क्या सच में इतना ? मैं तो ऐसा कुछ नहीं सोचती तो क्या मेरा प्यार कुछ कम है ?जाने क्यों एक अपराध बोध सा भर गया था मुझमे। तुमने फिर मुझे झकझोरा था बोलो ना।  मैं अभिभूत सी तुम्हारी बाँहों में समां गई थी खुद के भाग्य पर इठलाती।  अपने प्यार का विस्तृत आसमान पा कर मेरे सपनों के छोटे छोटे परिंदे पंख फड़फड़ाने लगे।  तुम्हारे प्यार का स्वर्ण महल मुझे खूब भाया और मैं उसमे खो गई। मेरे सपनों के परिंदे मुझे खुश देख कर कुछ समय तक अपनी उड़ान की आकांक्षा को मन के कोने में दबाये बैठे मुझे निहारते रहे  लेकिन कब तक ?
धीरे धीरे एक एक करके उन्होंने पंख फड़फड़ाने शुरू किये उनकी उड़ने की बैचेनी ने मुझे भी बैचेन कर दिया। मैं भी तो उन स्वप्न परिंदों के साथ उड़ना चाहती थी लेकिन तुम्हारे प्यार ने मुझे कैद कर लिया था कुछ इस तरह की उड़ाना तो दूर अपने पंख फैलाना भी मुश्किल था।  अब ये बैचेनी सही नहीं जा रही थी एक तरफ तुम्हारा प्यार था जिसने मुझे बाँध रखा था तो दूसरी तरफ मेरे सपने और दोनों का साथ तुम्हे मंजूर न था। लम्बी कश्मकश के बाद आखिर एक दिन मैंने सपने के हर परिंदे को आसमान देने की ठान ली।
कविता वर्मा  

Monday, June 30, 2014

नेपथ्य

नेपथ्य 
तेल चाल उखड़ी सांसे थकित तन और डूबता मन लिए वह चला जा रहा था कहाँ खुद भी नहीं जानता। उदासी ज्यादा गहरी थी या अन्धकार ये सोचने का ध्यान कहाँ था। आगे रास्ता है या नहीं ये समझने की कोशिश ही कहाँ की बस चलता रहा मानो मन की गति को मात देने भाग रहा हो बिना रुके बिना सोचे। मन छले जाने से व्यथित था या कुछ न कर पाने से ये भी तो नहीं पता। जीवन के झंझावातों से थक चुका था वह और अब तो उसके पैरों के नीचे से जमीन ही छीन ली गई थी। मन की गति ने थका दिया तो पैरों की गति अपने आप थम गई सामने अपार विस्तार सागर लहरा रहा था। लहरें किनारे पर सर पटक पटक ना जाने किस परेशानी को सुलझाने की कोशिश में लगी थीं।
किनारे खड़ा प्रकाश स्तम्भ पूरी ताकत से दूर तक रौशनी बिखेर रहा था वह वहीँ किनारे बैठ गया। लहरों पर पड़ती प्रकाश किरणे झंझावातों के कारण द्विगुणित हो कर ज्यादा चमक बिखेर रही थीं। बादलों की कालिमा के नेपथ्य में रोशनी की चमक कई गुना बढ़ कर ज्यादा दूर तक भटकों को राह दिखा रही थी।
इस विचार ने मानों उसके मन को प्रकाशित कर दिया।

Thursday, June 19, 2014

बलि

 आज ग्यारह तारीख हो गयी तनख्वाह नहीं मिली कर्मचारियों में बैचेनी थी धीमे स्वर में सुगबुगाहट फ़ैल रही थी लेकिन कोई खुल  कर सामने नहीं आ रहा था। विजया के मन में भी भारी उथल पुथल चल रही थी। आज सुबह ही उसने पति से कुछ पैसे मांगे थे जिसके बदले उसे झिड़की सुनने को मिली थी और मिले थे जरूरत से काफी कम रुपये एक एहसान सा जताते हुए। उसका मन विद्रोह कर उठा इच्छा तो हुई पैसे वापस कर दे लेकिन उसके बाद जो तूफ़ान उठ खड़ा होता उसे टालना ही ठीक था इसलिए चुपचाप रख लिए। 
हमेशा के इस अपमान से छुटकारा पाने के लिए ही वह नौकरी करने निकली थी सोचा था जब नौकरी करेगी तो उसके हाथ में खुद के कुछ पैसे होंगे और वह सम्मान से जीने की उम्मीद तो क्या करती लेकिन हाँ उस हद तक तिरस्कार से शायद बच सकेगी। 
 लेकिन इस नौकरी में जहाँ लगभग सभी महिला कर्मचारी है उनको उनकी मेहनत का पैसा देने में भी कोताही। 
छुट्टी से कुछ ही पहले एक एक को बुला कर तनख्वाह दी गयी लेकिन वह तय शुदा से काफी कम थी। विजया  के मन में असमंजस गहरा गया क्या करे इतने इंतज़ार के बाद मिले इन पैसों पर अपने सम्मान को कुर्बान कर के इन्हे रख ले या अपने आत्म सम्मान पर कुछ दिनों के लिए अपनी सहूलियतों की बलि चढ़ा दे ? 
कविता वर्मा 

Saturday, June 14, 2014

सबसे बड़ी ख़ुशी

पापा आज फिर आप मेरे लिये उड़ने वाला फाइटर प्लेन नहीं लाये नन्हे रोहित ने ठुनकते हुए कहा तो छोटी मुनिया कैसे पीछे रहती वह भी पापा के पैरों से लिपट कर गुड़िया ना लाने लिए उलाहना देने लगी। शशांक ने बेबसी से अपनी पत्नी की ओर देखा। अपने नन्हे बच्चों की छोटी छोटी ख्वाहिशे पूरी न कर पाने का दर्द उसकी आँखों में झलक आया था। शोमा क्या कहती समझती तो वह भी थी शशांक का दर्द उसकी मजबूरी। अचानक नौकरी छूट जाने की वजह से जीवन की गाड़ी पटरी से उत्तर गयी थी लेकिन नन्हे बच्चों को कैसे समझाया जाये ?शशांक सारा दिन दफ्तरों की खाक छानता शाम को जब उदास सा घर लौटता बच्चों की मासूम इच्छाए पूरी न कर पाने का दर्द नौकरी न मिलने के दर्द से मिल कर कई गुना हो जाता।
शशांक ने मुंह हाथ धोने के बहाने अपना दर्द धोने की कोशिश की और पत्नी से रोहित और मुनिया को तैयार करने को कहा।
"लेकिन कहाँ ले जाओगे उन्हें ?और अभी इतना खर्च कहाँ से करोगे पता नहीं अभी और कितने दिन …। "कहते कहते शोमा ने बात अधूरी छोड़ दी।
ये हमारे जिंदगी के संघर्ष हैं लेकिन बच्चों को खुश रखने की जिम्मेदारी मेरी है पिता हूँ मैं उनका। उन्हें खुशियां देना मेरा फ़र्ज़ है और खुशियां पैसों से नहीं खरीदी जाती। तुम उन्हें तैयार तो करो।
दोनों बच्चों का हाथ थामे शशांक घर से निकल गया।
बच्चों को दूर तक घुमा कर ढेर सारी बतकही करके जब वे वापस लौटे रोहित चहक रहा था ;पापा अब से हम रोज़ शाम को ऐसे ही घूमने चलेंगे।
पापा के साथ बिताया समय रोहित और मुनिया की आँखों में संतुष्टि बन कर चमक रहा था तो बच्चों को खुश करने की ख़ुशी उनके अभाव के साथ शशांक की आँखों में मोती बन कर झिलमिला रही थी।

हिस्सा ( लघुकथा )

 
मैरिज हाल के बाहर लगभग रोज़ ही जूठन का ढेर लगता था। आसपास की बस्तियों के बच्चे बूढ़े अौरतें बाहर खड़े हो कर इंतज़ार ही करते  थे कि कब अंदर खाना पीना शुरू हो कब ख़त्म हो और कब वे अपनी क्षुधा शांत करने के लिए जूठन पाएं जो कि उनके लिए बहुत बड़ी नेमत थी। जूठन के लिए यदा कदा उन लोगों में झगड़ा मारपीट तक हो जाती;  इसलिए जिसके हाथ जो आ जाता उसे लेकर वहां से दूर भागता ताकि ठीक से खा सके। 
वह बच्चा उस दिन शायद बहुत भूखा था लेकिन अकेला था बहुत कोशिशों के बाद भी वह भीड़ को चीर कर खाने के लिए कुछ नहीं जुटा पाया तो रुआँसा सा भीड़ से दूर गली के कोने पर जा कर खड़ा हो गया और ललचाई दृष्टी से छीना झपटी करते लोगों को देखने लगा।  एक बारगी तो लगा कि उस को आज भूखे ही रहना होगा। भगवान के इंसाफ पर शक होने लगा एक बेबस की भूख के लिए कोई जुगाड़ नहीं। तभी गली के छोर से दो लड़के हाथ में खाने का पैकेट लेकर गुजरे उनका पेट भर चुका था उन्होंने बचा हुआ खाना गली में फेंक दिया। वह बच्चा तुरंत उस पर झपटा और मिटटी पड़े खाने को वहीँ से खाने लगा। 
एक बारगी भगवान के इन्साफ पर यकीन हुआ  कि हर भूखे के लिए भोजन मुक़र्रर किया है ये बात अलग है  कि लोग दूसरों के हिस्से पर कब्ज़ा कर उसे बर्बाद कर देते हैं इसलिए कुछ लोग भूखे रह जाते हैं।  
कविता वर्मा 

Sunday, May 25, 2014

यादों का स्वाद

बचपन में झाबुआ जिले में रहते थे वहाँ आदिवासी जंगल से टोकनी भर भर केरियाँ  लाते थे और बहुत सस्ते में टोकरी का सौदा कर जाते थे।  गाँव का बहुत लम्बा चौड़ा मकान था। एक कमरे में पापा घास का पुआल बिछा कर वो कच्ची केरियाँ उस में रख देते थे कमरा बिलकुल बंद रहता था वह कमरा बार बार खोलने की मनाही थी( उसे पाल कहते थे ) .  दो चार दिन में केरियाँ पक कर आम बन जाती थीं। सुबह सुबह पापा उसमे से पके आम निकालते और आँगन में रख देते थे। मैं और दोनों भाई तालाब में तैरना सीखने जाते थे वहाँ से आ कर तेज़ भूख लगती थी तो आम खाने बैठ जाते थे, दादी आम का रस बनाती थीं ,खाने के लिए। उसके बाद जो आम बच जाते थे उसका रस थालियों में रख कर धूप  में सुखा  लिया जाता था आम पापड़ बनाने के लिए। उसमे कुछ आम उतर (ज्यादा पक कर स्वाद ख़राब हो जाना ) जाते थे। 
उस समय एक आदिवासी नौकर पीने का पानी नदी किनारे बने कुँए से लाता था। मम्मी ने उससे कहा , ये आम किसी के यहाँ ढोर डंगर हों तो उनके यहाँ दे दो वो खा लेंगे।  
उसने आम देखे और कहने लगा बाई साब ये तो अच्छे आम हैं मैं मामा लोगों (भील भीलाले ) को बेच दूँगा कुछ पैसे आ जाएँगे। 
मम्मी हैरान ,  ये सड़े आम कौन खरीदेगा ?
वो बोला यहाँ दूर गाँव के जो गरीब आदिवासी आते हैं वो अच्छे आम तो खरीद नहीं पाते वो ऐसे ही आम खरीद के खाते  हैं। यहाँ गाँव के बनिया लोग जो पाल लगाते हैं  उसमे से निकले ख़राब आम बेच देते हैं। वाकई मैंने गाँव के बड़े बड़े साहूकारों के अौटले पर ऐसे ख़राब आम की ढेरी बिकते देखी है। 
मम्मी ने कहा तुम ये आम ठेले पर रख लो और नदी पर जाते समय जो गरीब लोग मिले उन्हें बाँटते जाना। फिर ये रोज़ का क्रम बन गया था।  ( सन १९७८/८० ) ( बिटिया के संग आम खाते पुरानी यादों का स्वाद .)

Wednesday, May 14, 2014

समीक्षा :'परछाइयों के उजाले '

ड़ॉ वीरेंद्र स्वर्णकार निर्झर , सेवा सदन कॉलेज बुरहानपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष ने मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले ' की समीक्षा भेजी है।



Sunday, May 4, 2014

समीक्षा :एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी

कविता संग्रह - एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी


एक देश और मरे हुए लोग 
विमलेश त्रिपाठी जी का काव्य संग्रह ' एक देश और मरे हुए लोग'  हाथ में आने से पहले ही उनकी कई रचनाओं से फेस बुक के माध्यम से रूबरू हो चुकी थी।  उनकी कविताओं के विषय और उनका प्रस्तुतीकरण कवि की व्यवस्थाओं से उत्पन्न छटपटाहट का ताना बाना खींच देता है।  
पूरा संग्रह पाँच खण्डों मे बंटा है हर खंड में कमोबेश एक मिज़ाज़ की रचनाओं का संकलन है।  
पहला खंड 'इस तरह मैं ' में एक आदमी के आदमी होने की मज़बूरी , जिजीविषा और कसक को उकेरा गया है। कोलकाता जैसे बड़े शहर मे रहने के बावज़ूद भी अपनी जमींन से दूर होने और उनकी यादों से जुड़े होने का नॉस्टेलजिया छलक पड्ता है।  
पाठशाला का हुआ है विस्तार पास के कुऐं मे भर गई है मिट्टी / जिसके होने के निशान बाक़ी हैं मेरे अन्दर। 
'एक गॉँव हूँ ' में गाँव छोड़ कर आने की मज़बूरी एक कसक के साथ उभरी है। 
पत्थर बनते रहे धीरे धीरे पत्थरों बीच /सपने में कोई शहर नहीं आया क़भी  / नींद जब खुली तो हर बार गाँव से शहर आया। 
लुप्त होती पर्यावरणीय चेतना ,प्रक़ृति ,पंछी का छूटता साथ , उनसे टूटते रिश्तों की कसक लेकिन फ़िर भी पृथ्वी से जुड़ाव, यहीं रहने की ललक को सुन्दर और सरल शब्दों मे उकेरती रचनाएँ हैँ 'कहीं जाऊँगा नहीं ', 'मैं एक पेड़ ', 'पेड़ से कहता हूँ ', 'खिड़की पर फरगुदिया ' आदि।  
रिश्तों को करीब से देखते उनकी छटपटाहट को समझते हुए कुछ न कर पाने का दुख और उसे बाँट ना पाने का अफ़सोस, रोज़ी रोटी की मज़बूरी में अपनी जडें छोङ ज़मीन तलाशने की जद्दोजहद सोचने को विवश कर जाती है।  
अपने ही अन्दर जमीन का  कोई टुकङा बीनता सोचता हूँ मैं। 
कला जगत की दुश्वारियों पर व्यंग करते हुए उन्होने सहज शब्दों मे स्वीकार किया है कि वह अपनी नियति खुद चुनना चाहते हैं। ईमानदारी और सच्चाई की दुरुहता कुछ  तरह प्रकट हुए है ,
मैं हर बार सच बोलता / इस आशा मे / कि एक न एक दिन उसे / सच समझा जायेगा।  
इस दौर में सिर्फ इंसान बन कर रहना कितना मुश्किल है जबकि हर कोई ख़ास बनने क़ी कोशिश में और खास दिखने क़ी ख्वाहिश मे अपने अन्दर के इन्सान को पराजित करता जा रहा है। यह छटपटाहट और बैचेनी कई कविताओँ मे उभर कर आई  है जो कवि के सरल मन के दर्शन करवातीं है।  
ग्रामीण जीवन की त्रासदी, विकास का वहाँ ना पहुँच पाना, रोज़गार की तलाश में खाली होते गाँव , बाट जोहते भीख माँग  कर गुज़ारा करते बूढ़े और औरतें , सूखती नदियाँ , नहरें , पीछे छूटती अमराई , भगुआ चैता , कज़री जंतसार क़ी कसक के साथ मज़बूरियों को शब्द देती ये दो पंक्तियाँ अंतस को हिला देती हैं।  
इस तरह मैं कि बिना किसी  तर्क के बाजार मे खड़ी वह लङकी / जिसके लिए पेट ओर पेट के निचले हिस्से मे फर्क नहीं कोई।  

दूसरा खण्ड 'बिना नाम की नदियाँ ' में स्त्री होने की विवशता और अभिशप्त उनके भाग्य को बयान करती ये पंक्तियाँ 
पिता कहते अपना भाग्य लेकर आईं थीं साथ / इस तरह किसी दूसरे से नहीं जुड़ा था उनका भाग्य / सबका होकर रहना था पूरी उम्र अकेले हीं / उन्हें अपने हिस्से के भाग्य के साथ। 
दुखों से सामंजस्य की उनकी  क्षमता कुछ ऐसे बन पडी है 
उनके पास अपना कुछ नहीं था / सिवाय लड़की जात के उलाहने के / फिर भी खूब हँसती थीं वे। 
इन कविताओं मे तमाम बंधनों के बावज़ूद समय से थोड़ा वक्त अपने लिये चुराकर अपने सपनों को ज़ी लेने की जद्दोजहद करती लड़की, अपने दुःखों को हँसी ओर कहकहे क़ी चादर तले छुपा कर अपने अनुत्तरित प्रश्नों के साथ सदियों से जीती चली आ रही बेटियों के दुख को बख़ूबी शब्द दिये हैं।  भाइयों के प्रति उनके स्नेह ,क़भी कभी ईर्ष्या और पूरी उम्र निकलते इस प्रेम को समझ पाना  ए असफल की कहानी  'प्रेम ' की याद दिला देता है।  

तीसरा खण्ड 'दुःख सुख का संगीत' बचपन की सहेजी यादों से आज जमाने के सपनों और हकीकतों के अन्तर पर चुभती हुए दृष्टि डालता है। 
इसी खण्ड समाज़ मे व्याप्त जाति धर्म कि दीवारों पर चोट करतीं , अंतस के प्रेम और विश्वास को पोसती कई रचनाऐं हैं 
संबंधों  को नदी के पानी की तरह बचाना /सहेजना एक एक उसे प्रेम पत्रों की तरह 
या कि , मेरी ख़ुशी मे शामिल रहे तुम हमेंशा /तुम्हारे डर में शामिल रहा हमेशा मेरा डर

खण्ड 'कविता नहीं ' में कवि होने की आचार संहिता और जिजीविषा को ककहरे और जीवट के साथ उभारा है।  कविता कागज़ पर उकेरे कुछ अक्षर कुछ वाक्य नहीं हैं बल्कि पूरे समाज के साथ इंसान की इन्सान होने की जद्दोज़हद है। 
महज़ लिखनी नहीं होती है कविताएँ / बोलना ओर चलना होता है चार नहीं तो दो कदम ही /आदमी की तरह आदमी के लिये। 
बिना महसूस किये सिर्फ़ लिखने के लिये लिखने वालों पर एक मीठा व्यंग है जिसे यूँ तो मीठी गोली समझ कर निगला जा सकता है पर जब धीरज के साथ चूसा जाता है तो व्यंग  क़ी तल्ख़ी अंतस को चीर  देतीं है।  

' एक देश और मरे हुए लोग ' खण्ड की कविताएँ देश की दुर्दशा और आम आदमी की बेबसी को रोज़मर्रा क़ी छोटी छोटी  घटनाओं के गहन चिन्तन के साथ प्रस्तुत करती हैं। आम आदमी कब, कहाँ, क्यों किसी को गालियाँ देता है जैसी छोटी सी बात का विस्तृत विश्लेषण करती कई रचनाऐं लेखक की गहन गंभीर सोच को प्रस्तुत करतीं हैं।  क्या आम आदमी की नपुंसक क्रोध के प्रकटीकरण का दूसरा हथियार कविता है ? 
मैं अकेले घर मे बैठ कर / देता हूँ गालियाँ / इन सबके लिये जिम्मेदार लोगों को / और किसी को नहीं जानता।  
हर खण्ड मे एक शीर्षक से कई कई रचनाऐं हैं जो उस विचार को विस्तार देती हैं लेकिन उसे दुहराव से बचाते हुए हर बार उसे एक नये आयाम से देखते हुए। 'एक पागल आदमी की चिठ्ठी ', 'पानी ', 'आदमी की कविता ', में ये आयाम आपको हैरान कर देते हैं।  
पागल आदमी की चिठ्ठी मे /नींद नहीं होती /असंभव सपने होते हैं।  
या , पागल आदमी की चिठ्ठी मे रँग नहीं लिखे होते / हर रंग को समझता बूझता हुआ /जीवन भर वह बेरंग ही रहता है।  
शीर्षक कविता एक कहानी की तरह उत्सुकता जगाती आगे बढ़ती है जिसमे मरे हुए लोगों का प्रतिमान मरी सडी गली व्यवस्थाओं और उसे उसी तरह ढोते ओर ढोना चाहते लोगों के लिये किंचित व्यंग , आक्रोश और चिंता प्रतिपादित करते हैं।  यह कविता मरे लोगों के समाज मे जिन्दा व्यक्ति की त्रासदी और उसकी बैचेनी को जिस संवेदना के साथ बयान करती है उसमे इतिहास से लेकर वर्तमान तक को जिस खूबी के साथ समेटे है , कईं  ऐतिहासिक व्यक्तियों और  घटनाओं को बिना नाम लिये कह जाती है वह पढ़ना और समझना अभिभूत कर देता है। 
विमलेश जी की कवितायें सिर्फ़ पढनें के लिये नहीं हैं ,ना ही एक बैठक मे पूरी किताब खत्म कर देना कोई जीत या समझदारी है।  ये कवितायें सतत बहती हैं लेकिन आपको एक एक कविता पर ठहर कर उसे बार बार पढ़ने   समझने  और आत्मसात करने को विवश करती हैं। आगे बढ़कर बार बार पीछे लौटने को पुकारती ये रचनाऐं अपने सरल सहज शब्दों , सामान्य होते हुए भी गहरी संवेदनात्मक अनुभूति से विशेष  बन गयी छोटी छोटी बातों को सँजोये आपको हतप्रभ कर जाती हैं कि ये सब तो हमने भी देखा सुना था फ़िर इसे ऐसे महसूस क्यों नहीं कर पाये ? उत्तर बहुत आसान  है एक देश ओर मरे हुए लोग मे।  
कविता वर्मा 


Tuesday, April 29, 2014

'परछाइयों के उजाले' का विमोचन

मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले' का विमोचन वरिष्ठ चर्चाकार श्रीं जीवन सिंह ठाकुर और रंगकर्मी श्री ओम द्विवेदी के हाथों सम्पन्न हुआ। 



Monday, April 21, 2014

Friday, April 18, 2014

बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की: “परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का

बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की: “परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का: कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों क...

Tuesday, April 8, 2014

"परछाइयों के उजाले " प्रतिक्रिया

मेरे प्रथम कहानी संग्रह "परछा इयों के उजाले " पर "बेअदब साँसे "के रचयिता श्री राहुल वर्मा जी कि प्रतिक्रिया अभी अभी प्राप्त हुई जिसे मैं आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ।


Thursday, February 27, 2014

पीड़ा


कहाँ थीं तुम सारी रात ?जलते हुए प्रश्न में किसी अनहोनी की चिंता के स्थान पर अविश्वास की छाया पा कर सुराली के कदम एक पल को ठिठके। मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ बीस बरस के साथ का विश्वास एक रात में चुक गया। मन हुआ एक तीखा सा उत्तर दे लेकिन फिर खुद को रोक लिया और अंदर चली गयी। 
अविश्वास की जिस कटार से उसका दिल छलनी हुआ है जवाब ना मिलने से उपजी आशंका की पीड़ा उसे भी तो झेलने दो ,फिर तो अभी भाई आ कर बता ही देंगे कि माँ के पास हॉस्पिटल में थी वह सारी रात।
कविता वर्मा 



Wednesday, February 19, 2014

भास्कर मधुरिमा पेज़ २ पर मेरी कहानी 'शॉपिंग '…
http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/19022014/mpcg/1/

Sunday, February 16, 2014

ऐसा भी होता है


गली के नुक्कड़ पर जब से पान की दुकान खुली है मोहल्ले के लड़कों को ठिया मिल गया। सुबह से शाम तक मज़मा लगा रहता ,बातें और ठहाके गूंजते रहते। हालांकि किसी ने कोई ऐसी वैसी बात या हरकत नहीं की थी लेकिन फिर भी लड़कियाँ और औरतें वहाँ से गुज़रते हुए सिर और नज़रें झुका लेतीं। मोहल्ले के बड़े बूढ़े उनकी हँसी पर कुढ़ते रहते। 
एक सुनसान दोपहर किसी लड़की की चीख़ के साथ दौड़ने भागने चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दीं तो लोग दरवाज़े खोल कर बाहर आ गये, सभी को आशंका थी कि इन लड़कों ने किसी को छेड़ा होगा ,ये तो होना ही था। 
तभी एक लड़का मोहल्ले की एक लड़की को उसके घर तक छोड़ कर तेज़ी से वापस भागा। लड़की ने रोते हुए बताया बाज़ार से एक लड़का उसका पीछा करते हुए मोहल्ले तक आ गया। नुक्कड़ पर खड़े लड़कों ने उसे फब्तियाँ करते सुना तो सबने मिलकर उसकी पिटाई कर दी और उन्ही में से एक भैया उसे हिफाज़त से घर तक छोड़ने आये। सब हतप्रभ थे। 
कविता वर्मा 

Monday, February 10, 2014

पहली समीक्षा और प्रतिक्रिया कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले

मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले 'कि पहली समीक्षा और प्रतिक्रिया।

लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों की मैं बहुत प्रशंशक हूँ। सबसे पहले मैंने उनकी लिखी कहानी वनिता पत्रिका में पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। कहानी का नाम था " परछाइयों के उजाले " !
जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ', 'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत अच्छी है।
" जीवट " में फुलवा को जब तक यह अहसास नहीं हो जाता कि सभी सहारे झूठे है , तब तक वह खुद को कमजोर ही समझती है। कोई भी इंसान किसी के सहारे कब तक जी सकता है।
" सगा सौतेला " जायदाद के लिए झगड़ते बेटों को देख कर भाई को अपने सौतेले भाई का त्याग द्रवित कर जाता है लेकिन जब तक समय निकल जाता है। यहाँ यह भी सबक है कि कोई किसी का हिस्सा हड़प कर सुखी नहीं रह सकता। पढ़ते - पढ़ते आँखे नम हो गई।
" निश्चय " कहानी भी अपने आप में अनूठी है। यहाँ एक मालकिन का स्वार्थ उभर कर आता है कि किस प्रकार वह अपने घर में काम करने वाली का उजड़ता घर बसने के बजाय उजड़ देती है। एक माँ को बेटे से अलग कर देती है। जब मंगला को सच्चाई मालूम होती है तो उसका निश्चय उसे अपने घर की तरफ ले चलता है।
" आवरण " कहानी भी भी बहुत सशक्त है। यहाँ समाज के आवरण में छुपे घिनौने चेहरे दर्शाये है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक औरत का कोई भी नहीं होता है। उसे अपने उत्थान और सम्मान के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है और आवाज़ भी । तब ही उसके साथ दूसरे खड़े होते हैं। यहाँ भी सुकुमा के साथ यही हुआ। अगर वह आवाज़ नहीं उठाती तो वह अपने जेठ के कुत्सित इरादों कि शिकार हो जाती। औरत का आत्म बल बढ़ाती यह कहानी बहुत उम्दा है।
" परछाइयों के उजाले " एक अलग सी और अनूठी कहानी है। कहानी में भावनाओं के उतार चढाव में पाठक कहीं खो जाता है। यहाँ भी पढ़ते -पढ़ते आँखे नम हो जाती है। इस कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ मन को छू जाती है , " नारी का जीवन हर उम्र में सामाजिक बंधनो से बंधा होता है जो कि उसकी किसी भी मासूम ख्वाहिश को पाने में आड़े आता है। "
कविता जी की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी है। मेरी तरह से उनको हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं कि उनके और भी बहुत सारे कहानी संग्रह आएं।
मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ बल्कि एक प्रसंशक हूँ कविता जी कि कहानियों की।


Friday, January 24, 2014

परछाइयों के उजाले

'Parchhaiyon ke Ujale', a book by Kavita Verma .Stories are describing human behavior,women psychology ,their pressure and difficulties in taking decisions in day to day life and when pressure is in its extreme how they come up with strength to take decisions .

परछाइयों के उजाले लेखिका कविता वर्मा 
सामाजिक कहानियाँ 
मूल्य १२० रुपये (२४ फरवरी के पहले ऑर्डर पर )
फ्री पोस्टल 
आर्डर via  ई मेल kvtverma27@gmail.com


Monday, January 20, 2014

देसी पीसा की मीनार हुमा टेम्पल






यात्रा पर जाने का असली रोमांच होता है अजनबियों से मिलना ,बातें करना नयी नयी जानकारियाँ हासिल करना। पुरी से वापसी में ट्रेन में किसी कपल से मुलाकात हुई ,उन्होंने बताया कि सम्भलपुर के पास एक बहुत पुराना शिव मंदिर है जो तिरछा बना है जैसे की 'पीसा की मीनार ' य़ह मंदिर बहुत पुराना है और कई सालों से जस का तस है। ना ज्यादा झुका न गिरा। उन्होंने बहुत आग्रह करके कहा कि हम वह मंदिर जरूर देखें।  सुनकर बहुत उत्सुकता हुई लेकिन वहाँ जाने का रास्ता ,साधन की कोई जानकारी नहीं थी। 

खैर झारसुगुड़ा से हम पहले रेलवे स्टेशन पहुँचे लेकिन सम्भलपुर के लिए कोई ट्रेन अगले दो घंटे तक नहीं थी इसलिए वहाँ से बस स्टैण्ड गए। वहाँ हर आधे घंटे में सम्भलपुर के लिए बस मिलती है तो जो बस सामने दिखी उसी में बैठ गए। गाँवों कस्बों में चलने वाली गंतव्य तक पहुँचा देने वाली बस। रुकते रुकाते सवारियाँ चढ़ाते उतारते डेढ़ घंटे में उसने हमें सम्भलपुर में उतार दिया। यहाँ ऑटो वालों ने हमें घेर लिया। जैसे किसी विदेशी फ़िल्म में किसी भारतीय का चेहरा देखते ही हम चिंहुक जाते हैं वैसे ही ये ऑटो वाले पर्यटकों को देखते ही। मज़े की बात तो ये थी कि तब तक हमें मंदिर का नाम भी नहीं पता था ,सिर्फ इतना पता था कि यह मंदिर तिरछा बना है। सम्भलपुर से पैंतीस किलोमीटर दूर जाने आने का किराया बारह सौ से शुरू होकर आठ सौ तक आया,लेकिन सत्तर किलोमीटर ऑटो में सफ़र सोच कर ही ठीक नहीं लगा। फिर तलाश शुरू की बस की ,पता चला हर आधे घंटे में उसी चौराहे से बस मिलती हैं। एक ट्रेफिक हवलदार ने मंदिर का नाम बताया साथ ही बताया की धमा की बस में बैठ जाएँ। इतनी देर में बस आ गयी। टिकिट के पैसे देते हुए कण्डक्टर से कहा हुमा टेम्पल जाना है कहाँ उतरना होगा बता दे। 

बस से एक तिराहे पर उतरे वहाँ कुछ होटल थे लेकिन बंद थे आसपास कोई व्यक्ति ना था तभी मोटर बाइक पर दो तीन लड़के आते दिखे उनसे रास्ता पूछ कर किसी साधन के बारे में पूछा तो पता चला वहाँ जाने का कोई साधन नहीं मिलता मंदिर करीब तीन किलोमीटर था। खड़े रह कर समय बर्बाद करने से कोई फायदा था नहीं और जब इतनी दूर आ ही गए थे तो मंदिर के दर्शन किये बिना जाने का मन भी न था इसलिए बस बढ़े चले। दूर दूर तक फ़ैले सूखे खेत सामने सुनसान सड़क जिस पर कभी कभार ही कोई गाड़ी गुज़रती थी लोग मुड़ कर देखते हुए निकल जाते। करीब दो किलोमीटर चलने के बाद एक टवेरा आती दिखी तो उसे हाथ दे दिया बगल से निकली तो पता चला कि किसी की पर्सनल गाड़ी है लेकिन आश्चर्य थोड़ा आगे जा कर वह रुक गयी। दो लोगों के लिए उसमे जगह नहीं थी लेकिन उन्होंने कहा थोडा एडजस्ट कर सकते है तो बैठ जाइये एक किलोमीटर की ही तो बात है। 

संक्रांति का दिन होने से मंदिर के बाहर पूजन सामग्री की कई दुकाने सजी थीं लोग निज वाहन से आये थे। मंदिर का गुम्बद काफी झुका हुआ था। मंदिर के अंदर का द्वार भी तिरछा था। उसी प्रांगण में दो और मंदिर थे वे भी झुके हुए थे। मंदिर के निर्माण और झुके होने के बारे में कोई शिलालेख वहाँ नहीं था। गूगल देवी ने बताया मंदिर का निर्माण सम्भलपुर के पाँचवे बालियर सिंघ ने करवाया था।  नदी के पीछे एक नदी बहती है जिसमे बड़ी बड़ी कुड़ो मछलियाँ तैरती हैं जिन्हे लोग आटे की मीठी गोलियां खिलाते हैं। नदी में बोटिंग भी होती है।  
वापसी में फिर पदयात्रा शुरू की तिराहे से ऑटो फिर बस किसी तरह वापस पहुँचे एक अनोखे मंदिर की यात्रा कर मन संतुष्ट था।  
कविता वर्मा   








दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी  "मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे...