Monday, May 29, 2017

अथ भोजन मंथन


 वे गुरु हैं विचार मंथन के गुरु आज उनके घर के पास से गुजरते हुए बांके ने सोचा उनके दर्शन करते चलूँ। क्या पता आज कोई नया विचार नया नजरिया मिल जाये। जो मिलना ही है गुरु के यहाँ से खाली हाथ यानि खाली दिमाग तो लौटा नहीं जा सकता।
प्रणाम गुरूजी बांके ने साष्टांग करते हुए कहा।
गुरूजी गंभीर चिंतन में थे हलके से सिर हिला कर फिर चिंतन में डूब गए। यह सिर हिलना साष्टांग का जबाव और बैठने का इशारा दोनों ही थे। जो उनके सानिध्य में रहते रहते बांके समझने लगा था।
गुरूजी चिंतन करते हुए बांके को तिरछी चितवन से देखते रहे। जब देखा बांके बार बार पहलू बदल रहा है उस का धैर्य जवाब देने ही वाला है उन्होंने आँखें खोल दीं।
कहो बांके कैसे आना हुआ ?
गुरूजी इधर से गुजर रहा था सोचा दर्शन करते चलूँ। आज किसी विषय विशेष पर चिंतन चल रहा है बांके का धैर्य वाकई चुक गया था वह सीधा मुद्दे पर आ गया। आया है तो कोई नया विचार लेकर ही जाये ऑफिस ने सबको इम्प्रेस करने के काम आएगा।
तुमने रामायण पढ़ी है ?
बांके सिर खुजाने लगा सच कह नहीं सकता झूठ बोलने में शर्म लगी।
जी गुरूजी रामायण की कथा जानता हूँ। पूछने का मकसद जाने बिना गोलमोल जवाब देना ही ठीक है।
हम्म गुरूजी फिर गंभीर हुए। जानते हो कुम्भकर्ण गहरी नींद में था उसकी नींद की मियाद पूरी नहीं हुई और रावण को युद्ध के लिए उसकी जरूरत पड़ गई। ढोल नगाड़े भी उसकी नींद से उसे दूर नहीं कर सके। तब रावण ने सुस्वादु भोजन बनवाया जिसकी खुशबू ने कुम्भकर्ण की नींद खोल दी। वह खाने पर टूट पड़ा और भूल गया कि नींद उसके जीवन का लक्ष्य थी जिसके लिए उसने तपस्या की थी।
रामायण के इस प्रसंग ने बांके को सोच में डाल दिया। भोजन की महिमा तो उसने बचपन से सुनी और जानी ही थी। वो खुद भी कितनी ही बार अपने गुस्से और बढ़िया नींद को भोजन के लिए कुर्बान कर चुका था। बचपन में जब किसी बात पर गुस्सा होता था तो माँ उसके मनपसंद सेवइयों की खीर बनाती थी। शादी के बाद सास बहू के झगडे में उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए बीबी शाम की चाय के साथ गरमागरम पकोड़े तैयार करके रखती थी। उसके बाद वो कभी बीबी को गलत बता ही कहाँ पाया।
बांके अपना भोजन विमर्श करता रहा और आँखें मूंदे गुरु के ज्ञान चक्षु खुलते गए। वे कहने लगे देखो आधुनिक होते समय में भगवन के दरबार में अपनी अर्जी लेकर जब हजारों लाखों की संख्या में लोग जाने लगे और डिमांड और सप्लाई में बहुत बड़ा अंतर पैदा हो गया। इतनी उचित अनुचित मांगें आती थीं कि उनकी छंटनी करना ही मुश्किल था। बिना छंटनी के भी मांगें पूरी करें तो भी निबटारा होने में सालों लग सकते थे। तब भगवान् ने अपने एजेंटों के समक्ष अपनी चिंता जाहिर की। इस तरह से तो भक्तों का उन पर से विश्वास ही उठ जायेगा। एजेंट वह भी भारतीय और फिर धार्मिक अपने प्रभु को चिंता में कैसे डाल सकते थे ? उन्होंने तुरंत प्रसाद वितरण की योजना बनाई। देसी घी के सूखे मेवे युक्त लड्डू लेने के लिए भक्त टूट पड़ते और इस प्रसाद युद्ध में मात्र कुछ मुद्रा गँवा कर और विजयी हो कर जब बाहर आते घी और मेवे के स्वाद में ऐसे खो जाते कि खुद की अर्जी की बात खुद ही भूल जाते।
बांके को याद आया पिछले बरस वह भी पच्चीस रुपये का एक लड्डू लेने के लिए तीन घंटे लाइन में लगा था। वह गुरूजी के ज्ञान और निष्कर्ष से बहुत प्रभावित हुआ। उसके चेहरे पर यह भाव देख कर गुरु फिर शुरू हुए।
लगभग बीस साल पहले जब शिक्षा का प्रायवेटिकरण हुआ और सरकारी स्कूलों की नैया घोटालों भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने लगी। देश के नौनिहालों का भविष्य खतरे में पड़ने लगा और शिक्षा खुद को इस दलदल से निकालने में खुद को असमर्थ पाने लगी उसने जनता का ध्यान मिड डे मील की तरफ कर दिया। स्कूल में मास्टर जी आये थे कि नहीं क्या पढ़ाया के बजाय माएँ क्या बना था क्या खाया किसने परसा पेट भर परोसा या नहीं पूछने लगीं। गाँव की गलियों में नंगधडंग घूमते बच्चों को माएँ समय से नहला धुला कर तैयार करतीं ताकि मास्टर सूरत पहचान लें और खाना खाने स्कूल भेज देतीं।
शिक्षा की नैया डुबोने के बाद और बच्चों और माता पिता को पतली दाल में ख़ुशी के गोते लगाते छोड़ अब नए सेक्टर तलाशे जाने लगे।
कौन से नए सेक्टर गुरु जी। बांके इस भोजन चिंतन से मुग्ध हो चुका था।
गुरु जी ने आवाज़ की श्रद्धा और कोमलता नापी और उनका चिंतन फिर पटरी पर आ गया। कहने लगे देखो देश का सबसे बड़ा नेटवर्क चाहे कितना ही कर लो कभी पटरी पर नहीं चल पाता था। भीड़ गन्दगी रिज़र्वेशन में एजेंटों की घुसपैठ घंटों की देरी जनता में आक्रोश भर रही थी। भगवन की तरह सरकार भी सोच में पड़ गई और फिर स्टेशन से लेकर चलती ट्रेन तक में भोजन की व्यवस्था की गई। कुछ गाड़ियों में फाइव स्टार भोजन नाश्ता परोसा गया। लोग खाने में व्यस्त रहे उन्हें कोच में घूमते चूहे कॉक्रोच बदबू मारते कंबल सामान बेचते उठाईगीर आउटर पर या क्रॉसिंग के लिए खड़ी लेट होती ट्रेन सब नज़रअंदाज़ होती गई। पैसेंजर अपने खाने में मस्त रहते और पाँच सात घंटे देर से पहुँचने के बाद भी बीवी को बताते प्रभु कृपा से इतना अच्छा खाना मिला कि मन तृप्त हो गया। आज ट्रैन में बैठे बैठे मैंने कम से कम दो ढाई हज़ार मैसेज डिलीट कर दिए।
बांके को अपनी पिछली ट्रैन यात्रा याद आ गई जब वह बीबी को लेने ससुराल गया था। चैन के दिन बीत जाने की बैचेनी से ट्रैन की कैटरिंग ने ही उसे उबारा था। और यह भी सच है कि एक महीने के उन अच्छे दिनों के प्रतीक कोई दस बारह नंबर और तीन हजार एक सौ चौदह मैसेज फोटो ऑडियो वीडियो भी उसने उसी समय में डिलीट किये थे। तो क्या गुरूजी भी ? मन में कुलबुलाते इस विचार को उसने आस्था रुपी टेबल नेपकिन से पोंछ डाला।
गुरूजी उसकी तन्मयता देख कर जोश में आ गए फिर कहने लगे। देखो आजकल शादियों में दूल्हा दुल्हन की जोड़ी कैसी है दहेज़ में क्या लिया दिया लड़के लड़की का बाप क्या करता है जैसी बातें कोई नहीं पूछता लेकिन खाने में क्या है सब पूछते हैं। कई अन्नपूर्णा के पुजारी लोग तो आशीर्वाद देने से पहले ही पानी पूरी दही भल्ले के स्टॉल पर पहुँच जाते हैं। कहते हुए गुरूजी ने अपनी तोंद पर हाथ फेरा और गहरी सांस लेकर किचेन से आती खुशबू से अंदाजा लगाने की कोशिश की कि क्या पक रहा है ?
बांके भी अब तक इस चिंतन से पर्याप्त परिपक्व हो चुका था। गुरूजी के संकेत भी वह बखूबी ग्रहण कर रहा था। उसने उठ कर फिर साष्टांग किया और आज्ञा माँगी। बांके के कूच करते ही गुरूजी किचन की तरफ लपके। लौकी के कोफ्ते की खुशबू ने आज फिर एक चिंतन वीर को उसका लक्ष्य भुला दिया था।
कविता वर्मा

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